Saturday, 25 January 2025

गर्मी की छुट्टियाँ

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#इन्दु_बाला_सिंह


गर्मी की छुट्टियाँ होते ही दूसरे दिन रेल का टिकट कटा कर हमारा पूरा परिवार जनरल डब्बे में बैठ कर उत्तर प्रदेश के अपने पुश्तैनी मकान में पहुँच जाता था । समझने की बात है बात है बैठने को सीट कभी कभी मिलती थी हमें । प्रायः हम ट्रंक पर ही बैठ कर डेढ़ दिन की यात्रा करते थे ।

हमारे गाँव में बिजली नहीं पहुँची थी ।घड़ी भी न थी । बखरी की दीवाल पर सूर्य की रोशनी के उतार चढ़ाव पर समय का ज्ञान होता था ।


पिता तो दालान में बाहर बैठ के आराम से दादा और ताऊ से बतियाते थे माँ के हिस्से में रसोईं रहती थी ।

दोपहर में हम शहर के रेलवे स्टेशन  से एक घंटे चल कर अपने गाँव पहुँचते थे तो शाम का ख़ाना तो बना कर हमें मेरी ताई खिला देती थी पर दूसरे दिन से मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी जला कर पूरे परिवार का  ख़ाना बनाना मेरी माँ के ज़िम्मे आ जाता था । लकड़ी की आग  में रोटिया बनाना माँ को कितना कष्टदारक होता था होगा यह मैं आज समझ सकती हूँ । 


रात में न तो डिबरी जलती थी न ही लालटेन । चाँद तारों की रोशनी में हम चलते थे । वैसे चलने की ज़रूरत नहीं थी हमें ।ख़ाना पीना दिन डूबने से पहले हो जाता था । बखरी के बीच औरतों के लिये आँगन था । वहीं खाट बिछा कर सब औरतें सो जातीं थीं। मैं अपनी ताई के बग़ल सोती थी और वे कहानियाँ सुनातीं थीं । वे कभी कभी कहानी ख़त्म कर सो जातीं थीं और मैं आकाश के तारे देखती रहती थी । शायद तभी से मुझमें आकाश के प्रति आकर्षण बढ़ा । मैं तारों का ज्ञान पाना चाहती थी । कभी कभी ताई चुड़ैल की कहानी सुनाती थी । वे जब नींद में खर्राटें लेने लगतीं थीं तब डर कर मैं अपने इर्द गिर्द की कोठरियों को देखने लगती थी ।उन्होंने ही शीत बसंत की कहानी सुनाई थी ।


मैं ताई की खाट पर सो उनकी कहानियाँ सुन पाती थी क्योंकि उनका बेटा था और वो मर्दों के साथ दालान में सोता था ।


हमारे बखरी के दालान को अंदर के आँगन से जोड़नेवाला दरवाज़ा मर्दों के खाने के बाद अंदर से साँकल चढ़ा कर बंद कर दिया जाता था ।


शहर में हमारे घर में कोयले के चूल्हे पर ख़ाना बनता था । फिर माँ को जाँत पर गेहूं पीसने ओखली में चना या अरहर कूटने  से आसान लगता था ।


पर मुझे ताई के साथ जाँत चला कर गेहूं पीसने में मजा आता था ।


गर्मी की छुट्टियों के बाद अपने साइकिल पर हमारा ट्रंक रख कर ताऊ हमें स्टेशन पहुँचाते थे और हमें रेल में बैठा देते थे ।


हम जब वापस अपने घर लौटते थे तो हमारे आँगन में दो फुट की घास हो गयी होती थी ।



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