Saturday, 25 January 2025

पुस्तकों के बीच खिलता यौवन

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#इन्दु_बाला_सिंह


मेरे पिता sail के  ISE स्कूल में हिन्दी टीचर थे । उन्होंने स्कूल की लाइब्रेरी में बहुत सारा हिन्दी साहित्य रखवाया था । 


हमारे समय में बोर्ड परीक्षा दिसम्बर में होती थी । कॉलेज एडमिशन जून में होता था । स्कूल लाइब्रेरी से किताबों का बोझा साइकिल में ले के घर आती थी और पढ़ कर वापस करती थी ।इस तरह मैंने बहुत सा हिंदी साहित्य पढ़ा ।


फिर मेरे पिता का ट्रांसफ़र दूसरे स्कूल में हेडमास्टर बना कर हुआ । वहाँ भी हिन्दी साहित्य भरा था । वहीं मैंने प्रेमचन्द्र , बंकिम चन्द्र और शरत् चन्द्र का साहित्य पढ़ा ।


कुछ हिन्दी के अध्यापक स्कूल की लाइब्रेरी में हिन्दी साहित्य रखवाते थे । 


हमारे घर में कादंबिनी और फेमिना ( अंग्रेज़ी का ) पत्रिकायें और हिंदुस्तान टाइम्स ( अंग्रेज़ी का ) आता ही था ।


इन पुस्तकों का मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा । 


मुझे आज भी लगता है कि नौकरी न करनेवाली महिलायें जो पुस्तकें , पत्रिकायें , अख़बार पढ़ती हैं वे बहुत ज्ञानी होती हैं ।



एक पेड़ ज़रूर लगायें


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#इन्दु_बाला_सिंह


मेरे पिता ने तीन आम का पेड़ लगाया था । कहते हैं कोई जाता है तो उसके अंतिम संस्कार में एक पेड़ की लकड़ी लग जाती है । तीसरा पेड़ लगता है वो मेरे नाम का लगा था । मैं अकेली थी । मेरी चिंता भी मेरे पिता को थी ।



गर्मी की छुट्टियाँ

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#इन्दु_बाला_सिंह


गर्मी की छुट्टियाँ होते ही दूसरे दिन रेल का टिकट कटा कर हमारा पूरा परिवार जनरल डब्बे में बैठ कर उत्तर प्रदेश के अपने पुश्तैनी मकान में पहुँच जाता था । समझने की बात है बात है बैठने को सीट कभी कभी मिलती थी हमें । प्रायः हम ट्रंक पर ही बैठ कर डेढ़ दिन की यात्रा करते थे ।

हमारे गाँव में बिजली नहीं पहुँची थी ।घड़ी भी न थी । बखरी की दीवाल पर सूर्य की रोशनी के उतार चढ़ाव पर समय का ज्ञान होता था ।


पिता तो दालान में बाहर बैठ के आराम से दादा और ताऊ से बतियाते थे माँ के हिस्से में रसोईं रहती थी ।

दोपहर में हम शहर के रेलवे स्टेशन  से एक घंटे चल कर अपने गाँव पहुँचते थे तो शाम का ख़ाना तो बना कर हमें मेरी ताई खिला देती थी पर दूसरे दिन से मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी जला कर पूरे परिवार का  ख़ाना बनाना मेरी माँ के ज़िम्मे आ जाता था । लकड़ी की आग  में रोटिया बनाना माँ को कितना कष्टदारक होता था होगा यह मैं आज समझ सकती हूँ । 


रात में न तो डिबरी जलती थी न ही लालटेन । चाँद तारों की रोशनी में हम चलते थे । वैसे चलने की ज़रूरत नहीं थी हमें ।ख़ाना पीना दिन डूबने से पहले हो जाता था । बखरी के बीच औरतों के लिये आँगन था । वहीं खाट बिछा कर सब औरतें सो जातीं थीं। मैं अपनी ताई के बग़ल सोती थी और वे कहानियाँ सुनातीं थीं । वे कभी कभी कहानी ख़त्म कर सो जातीं थीं और मैं आकाश के तारे देखती रहती थी । शायद तभी से मुझमें आकाश के प्रति आकर्षण बढ़ा । मैं तारों का ज्ञान पाना चाहती थी । कभी कभी ताई चुड़ैल की कहानी सुनाती थी । वे जब नींद में खर्राटें लेने लगतीं थीं तब डर कर मैं अपने इर्द गिर्द की कोठरियों को देखने लगती थी ।उन्होंने ही शीत बसंत की कहानी सुनाई थी ।


मैं ताई की खाट पर सो उनकी कहानियाँ सुन पाती थी क्योंकि उनका बेटा था और वो मर्दों के साथ दालान में सोता था ।


हमारे बखरी के दालान को अंदर के आँगन से जोड़नेवाला दरवाज़ा मर्दों के खाने के बाद अंदर से साँकल चढ़ा कर बंद कर दिया जाता था ।


शहर में हमारे घर में कोयले के चूल्हे पर ख़ाना बनता था । फिर माँ को जाँत पर गेहूं पीसने ओखली में चना या अरहर कूटने  से आसान लगता था ।


पर मुझे ताई के साथ जाँत चला कर गेहूं पीसने में मजा आता था ।


गर्मी की छुट्टियों के बाद अपने साइकिल पर हमारा ट्रंक रख कर ताऊ हमें स्टेशन पहुँचाते थे और हमें रेल में बैठा देते थे ।


हम जब वापस अपने घर लौटते थे तो हमारे आँगन में दो फुट की घास हो गयी होती थी ।



मैं और मेरा लेखन

 


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#इन्दु_बाला_सिंह 


मेरे प्री प्रोफेशनल  ( बी एस सी के फर्स्ट ईयर)  के एग्जामिनेशन के बाद  मेरे पिता का ट्रांसफ़र माईन्स एरिया पुरना पानी में ट्रांसफ़र हो गया ।  


हम सब खुश थे पिता हेडमास्टर बन गये थे । हम अब टू बेडरूम वाले घर में रह रहे थे । पर माईन्स एरिया में कॉलेज नहीं था । छोटी सी जगह थी वह मात्र एक हाई स्कूल , दो चार दुकानें , एक पोस्ट ऑफिस और एक छोटा प्राथमिक चिकित्सालय था वहाँ । हर चीजों के लिये हम राउरकेला शहर पर निर्भर थे ।


समस्या मेरी पढ़ाई को ले के थी । मुझे कॉलेज की पढ़ाई के लिये हॉस्टल में रहना पड़ा । मेरे शरीर  को हॉस्टल का ख़ाना न लगा । मैं बीमार पड़ती रही ।


ग्रेजुएशन के बाद ब्याह हुआ तो जमशेदपुर पहुँची । सोची हिन्दी जगत से जुड़ूँगी ।


पर भाग्य को मंज़ूर न था ।


लेखन मेरे लिये तिलिस्म हो गया ।


लिखती रही और लेखन फाड़ती रही ।


दो कहानी संग्रह और दो उपन्यास फाड़े मैंने ।


पर मोह न छूटा लेखन से ।


बरस दर बरस गुजरते गये ।


फ़ेसबुक आया  और मैं फिर संजोने लगी लेखन ।


21/10/24



मित्र की तलाश

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#इंदु_बाला_सिंह 


मैं पंद्रह सोलह के उम्र में एक गाना से प्रभावित थी । 


उसकी एक पंक्ति यहाँ लिखना चाहूँगी।


‘ पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले 


झूठा ही सही ..…’


इस पंक्ति को मैं दोस्ती की तरह लेती थी । आज 


सोंचती हूँ मैं ऐसी क्यों थी ।


उस समय मेरा कोई दोस्त नहीं था । इसलिये खेल नहीं 


पाती थी । बातें नहीं कर पाती थी किसीसे ।बाजार से 


सौदा लाना राशन के दुकान से कंट्रोल के लाइन में लग 


कर गेहूं लाना काम था मेरा । दूध भी दुहा के लाती थी 


पिता के किसी मित्र के घर से । बाकी समय अपने छोटे


 भाइयों को गोद में ले कर घूमती थी । तब माँ घर के 


काम करती दे। घर में माँ पर इतना काम होता था कि 


वो कभी चक्कर खा के गिर जाती थी ।पिता सुबह का 


निकले काम से रात नौ बजे लौटते थे ।


तो झूठे ही सही लगनेवाले मित्र नहीं थे मेरे ।


इस पंक्ति का ऐसा प्रभाव पड़ा मेरे जीवन पर कि मैं 


सपनों के दुनियाँ में रहने लगी ।


यों कहिये वर्तमान में जी भौतिक तौर पर लेकिन 


काल्पनिक तौर मित्र की तलाश रही ।


आज सोंचती हूँ मैंने मानने में बहुत देरी कर दी कि मैं


 सदा मित्रहीन ही रहूँगी ।


जीवन संध्या में आज मैं ख़ुश हूँ ।


मेरी मित्र की तलाश  ख़त्म हुई ।


अब मैं वास्तविकता में जी रही हूँ ।



अभ्यास पुस्तिका का अंत

मेरे पिता अमर नाथ सिंह ने हिंदी व्याकरण की अभ्यास पुस्तिका लिखी थी नवीं और दसवीं कक्षा के लिये। वे इस्पात इंग्लिश मीडियम स्कूल, राउरकेला के ...