Saturday, 25 January 2025

मित्र की तलाश

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#इंदु_बाला_सिंह 


मैं पंद्रह सोलह के उम्र में एक गाना से प्रभावित थी । 


उसकी एक पंक्ति यहाँ लिखना चाहूँगी।


‘ पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले 


झूठा ही सही ..…’


इस पंक्ति को मैं दोस्ती की तरह लेती थी । आज 


सोंचती हूँ मैं ऐसी क्यों थी ।


उस समय मेरा कोई दोस्त नहीं था । इसलिये खेल नहीं 


पाती थी । बातें नहीं कर पाती थी किसीसे ।बाजार से 


सौदा लाना राशन के दुकान से कंट्रोल के लाइन में लग 


कर गेहूं लाना काम था मेरा । दूध भी दुहा के लाती थी 


पिता के किसी मित्र के घर से । बाकी समय अपने छोटे


 भाइयों को गोद में ले कर घूमती थी । तब माँ घर के 


काम करती दे। घर में माँ पर इतना काम होता था कि 


वो कभी चक्कर खा के गिर जाती थी ।पिता सुबह का 


निकले काम से रात नौ बजे लौटते थे ।


तो झूठे ही सही लगनेवाले मित्र नहीं थे मेरे ।


इस पंक्ति का ऐसा प्रभाव पड़ा मेरे जीवन पर कि मैं 


सपनों के दुनियाँ में रहने लगी ।


यों कहिये वर्तमान में जी भौतिक तौर पर लेकिन 


काल्पनिक तौर मित्र की तलाश रही ।


आज सोंचती हूँ मैंने मानने में बहुत देरी कर दी कि मैं


 सदा मित्रहीन ही रहूँगी ।


जीवन संध्या में आज मैं ख़ुश हूँ ।


मेरी मित्र की तलाश  ख़त्म हुई ।


अब मैं वास्तविकता में जी रही हूँ ।



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