Friday, 24 October 2025

अभ्यास पुस्तिका का अंत

मेरे पिता अमर नाथ सिंह ने हिंदी व्याकरण की अभ्यास पुस्तिका लिखी थी नवीं और दसवीं कक्षा के लिये। वे इस्पात इंग्लिश मीडियम स्कूल, राउरकेला के हिंदी विषय के शिक्षक थे । 
उन्होंने वह अभ्यास पुस्तिका लिख कर छपाई थी और उसे राउरकेला के हर स्कूल की नवीं और दसवीं कक्षा में लगवाया था । उसके बाद उनका प्रमोशन सेल के पूरनापानी माइंस के हाई स्कूल में हेडमास्टर के रूप में हो गया । उनका मन उस अभ्यास पुस्तिका से हट गया । सात आठ वर्षों तक एक कार्टन वे पुस्तिकाएं घर में पड़ी रहीं । फिर मेरे पिता ने उन पुस्तिकाओं को रद्दी में बेच दिया । दो पुस्तिकाएं मैने अपने पास रख ली । मन में आस थी की मैं उन्हें छपवाउंगी और उन्हें स्कूलों में लगवाऊंगी । आर्थिक अभाव के कारण मैं अपनी इच्छा पूर्ति न कर पाई । करीब पच्चीस तीस वर्ष बाद उन दोनों पुस्तिकाओं को मैने रद्दीवाले को बेच दिया ।  

आज साठ वर्ष बाद वे पुस्तिकाएं और पिता का उस पुस्तिका को लिखने की इच्छा शक्ति और श्रम याद आ रहा है ।

Thursday, 12 June 2025

लिफ्ट में अनाउंसमेंट



बारहवें तल्ले से मैं लिफ्ट नंबर 2 में चढ़ी एक मिनट में ही लिफ्ट में कुछ अनाउंसमेंट करने लगा ।
मुझे कुछ समझ में ही न आया । मैं डर के लिफ्ट देख रही थी । पर लिफ्ट चलती जा रही थी ।

लिफ्ट सीधे ग्राउंड फ्लोर में रुकी । मैं निकली तभी एक हॉकर अपनी पीठ पर पच्चीस किलो चावल की बोरी ले के घुसने लगा लिफ्ट में ।

मैने कहा - लिफ्ट में कुछ बोल रहा है । 

वह हॉकर डर के बाहर निकल गया ।

मैने उस हॉकर से सिक्योरिटी को कंप्लेन करने कहा ।

उस हॉकर ने कहा अभी अभी तो सिक्योरिटी गार्ड दौड़ का अंदर ऑफिस की तरफ भागा है ।

लिफ्ट नंबर 2 बंद ही नहीं हो रही थी ।

कुछ लोग कहने लगे लिफ्ट के पास कोई दिया जलाया होगा या धूपबत्ती रखा होगा ।

यह बिगड़ी लिफ्ट में मेरा दूसरा अनुभव था ।

अब तो मैं लिफ्ट में  हर समय चौकन्नी रहती हूं ।

फिर खुद पर हंसती हूं । मेरे चौकन्नी रहने से जैसे बिगड़े लिफ्ट की समस्या जैसे ठीक हो जाएगी ।

दूरदर्शन और इंदिरा गांधी

इकतीस अक्तूबर सन चौरासी के दिन मैं  स्कूल से घर पैदल लौटी । मैं स्कूल पढ़ने के लिए पैदल ही जाती थी और लौटती भी थी । मेरे घर से स्कूल की दूरी पैदल चलने से पंद्रह मिनट की ही थी ।

घर पहुंचने पर मेरे  पिता ने कहा कि इंदिरा गांधी को उनके सिक्योरिटी गार्ड ने मार दिया है ।

हमारे घर में टी ० वी ० नहीं थी उस समय ।

हमारे घर के पास वाले ने नई टी ० वी० खरीदी थी उस समय । उनके ड्राइंग रूम का दरवाजा खुला रहता था । जिसको जब मौका मिले उनके घर जा कर इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर के दर्शन करता था ।

Saturday, 25 January 2025

पुस्तकों के बीच खिलता यौवन

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#इन्दु_बाला_सिंह


मेरे पिता sail के  ISE स्कूल में हिन्दी टीचर थे । उन्होंने स्कूल की लाइब्रेरी में बहुत सारा हिन्दी साहित्य रखवाया था । 


हमारे समय में बोर्ड परीक्षा दिसम्बर में होती थी । कॉलेज एडमिशन जून में होता था । स्कूल लाइब्रेरी से किताबों का बोझा साइकिल में ले के घर आती थी और पढ़ कर वापस करती थी ।इस तरह मैंने बहुत सा हिंदी साहित्य पढ़ा ।


फिर मेरे पिता का ट्रांसफ़र दूसरे स्कूल में हेडमास्टर बना कर हुआ । वहाँ भी हिन्दी साहित्य भरा था । वहीं मैंने प्रेमचन्द्र , बंकिम चन्द्र और शरत् चन्द्र का साहित्य पढ़ा ।


कुछ हिन्दी के अध्यापक स्कूल की लाइब्रेरी में हिन्दी साहित्य रखवाते थे । 


हमारे घर में कादंबिनी और फेमिना ( अंग्रेज़ी का ) पत्रिकायें और हिंदुस्तान टाइम्स ( अंग्रेज़ी का ) आता ही था ।


इन पुस्तकों का मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा । 


मुझे आज भी लगता है कि नौकरी न करनेवाली महिलायें जो पुस्तकें , पत्रिकायें , अख़बार पढ़ती हैं वे बहुत ज्ञानी होती हैं ।



एक पेड़ ज़रूर लगायें


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#इन्दु_बाला_सिंह


मेरे पिता ने तीन आम का पेड़ लगाया था । कहते हैं कोई जाता है तो उसके अंतिम संस्कार में एक पेड़ की लकड़ी लग जाती है । तीसरा पेड़ लगता है वो मेरे नाम का लगा था । मैं अकेली थी । मेरी चिंता भी मेरे पिता को थी ।



अभ्यास पुस्तिका का अंत

मेरे पिता अमर नाथ सिंह ने हिंदी व्याकरण की अभ्यास पुस्तिका लिखी थी नवीं और दसवीं कक्षा के लिये। वे इस्पात इंग्लिश मीडियम स्कूल, राउरकेला के ...