मेरे पिता अमर नाथ सिंह ने हिंदी व्याकरण की अभ्यास पुस्तिका लिखी थी नवीं और दसवीं कक्षा के लिये। वे इस्पात इंग्लिश मीडियम स्कूल, राउरकेला के हिंदी विषय के शिक्षक थे ।
उन्होंने वह अभ्यास पुस्तिका लिख कर छपाई थी और उसे राउरकेला के हर स्कूल की नवीं और दसवीं कक्षा में लगवाया था । उसके बाद उनका प्रमोशन सेल के पूरनापानी माइंस के हाई स्कूल में हेडमास्टर के रूप में हो गया । उनका मन उस अभ्यास पुस्तिका से हट गया । सात आठ वर्षों तक एक कार्टन वे पुस्तिकाएं घर में पड़ी रहीं । फिर मेरे पिता ने उन पुस्तिकाओं को रद्दी में बेच दिया । दो पुस्तिकाएं मैने अपने पास रख ली । मन में आस थी की मैं उन्हें छपवाउंगी और उन्हें स्कूलों में लगवाऊंगी । आर्थिक अभाव के कारण मैं अपनी इच्छा पूर्ति न कर पाई । करीब पच्चीस तीस वर्ष बाद उन दोनों पुस्तिकाओं को मैने रद्दीवाले को बेच दिया ।
आज साठ वर्ष बाद वे पुस्तिकाएं और पिता का उस पुस्तिका को लिखने की इच्छा शक्ति और श्रम याद आ रहा है ।